Blood Vascular System – रक्त परिसंचरण तन्त्र

Blood, RBC, WBC
Blood Vascular System – रक्त परिसंचरण तन्त्र, Blood Corpuscles, Red Blood Corpuscles, RBC, White Blood Corpuscles, WBC, Heart, Artery, Vein

इस तन्त्र द्वारा शुद्ध रुधिर का परिसंचरण (Circulation) हृदय से धमनी ( Artery ) द्वारा सम्पूर्ण शरीर को तथा अशुद्ध रक्त का परिसंचरण सम्पूर्ण शरीर से हृदय को ‘शिराओं ( Veins ) द्वारा होता है।

रुधिर परिसंचरण तन्त्र की खोज 1628 ई. में विलियम हार्वे नामक वैज्ञानिक ने किया।

परिसंचरण तंत्र के दो प्रकार होते हैं जिन्हें क्रमशः खुला और बन्द परिसंचरण तंत्र कहा जाता है।

खुला परिसंचरण तंत्र ( Open Circulatory System ) आर्थोपोडा संघ (काकरोज, केकड़ा, प्रान (झींगा मछली), मच्छर, मक्खी आदि) तथा मोलस्का संघ (घोंघा, सीपी, आक्टोपस आदि) के जन्तुओं में खुला परिसंचरण तंत्र विकसित प्रकार का होता है।

बन्द परिसंचरण तंत्र ( Closed Circulatory System ) सभी विकसित जन्तुओं में जैसे- मछली, मेढ़क, सर्प, पक्षी, केंचुआ, ऐस्केरिस तथा स्तनधारी संघ (मनुष्य) में इस प्रकार का | परिसंचरण तंत्र पाया जाता है।

मनुष्य बन्द विकसित तथा दोहरे प्रकार का परिसंचरण तंत्र पाया जाता है।

मनुष्य का परिसंचरण तंत्र तीन घटकों से मिलकर बना होता है।

जिन्हें क्रमशः रुधिर, हृदय तथा रुधिर वाहिनिकाएँ कहा जाता है।

रूधिर ( Blood )

रूधिर एक तरल संयोजी ऊतक है जिसका निर्माण मनुष्य | में अस्थिमज्जा से होता है जबकि भ्रूणावस्था में रूधिर का | निर्माण यकृत और प्लीहा से होता है।

एक सामान्य मनुष्य के शरीर में 5 से 6 लीटर रूधिर पाया जाता है जो प्रतिशत में 7 से 8 प्रतिशत पाया जाता है।

रूधिर का निर्माण दो घटक से होता है जिन्हें क्रमशः रूधिर प्लाज्मा और रूधिर कणिकाएँ कहा जाता है।

रूधिर प्लाज्मा

रूधिर प्लाज्मा का निर्माण जल, कार्बनिक तथा अकार्बनिक पदार्थों से होता है। रूधिर प्लाज्मा में जल 90 से 92 प्रतिशत | पाया जाता है जबकि कार्बनिक पदार्थ के रूप में सर्वाधिक मात्रा में प्रोटीन पायी जाती है।

रूधिर कणिकाएँ ( Blood Corpuscles )

रूधिर कणिकाएँ सम्पूर्ण रूधिर का 40 से 45 प्रतिशत भाग | बनाती हैं जो कार्य एवं संरचना के आधार पर तीन प्रकार की होती हैं जिन्हें क्रमशः RBC, WBC एवं Blood Platelets कहा जाता है।

RBCलाल रूधिर कणिकाएँ ( Red Blood Corpuscles )

  • RBC को एरिथ्रोसाइट्स के नाम से जाना जाता है जिनका निर्माण लाल अस्थिमज्जा वाले भाग से होता है।
  • भ्रूणावस्था में RBC का निर्माण यकृत तथा प्लीहा से होता है।
  • RBC संरचना में अण्डाकार होती हैं।
  • RBC का जीवनकाल मनुष्य के शरीर में 120 दिन का होता है।
  • संसार के समस्त स्तनधारी प्राणियों के RBC में केन्द्रक नहीं पाया जाता है लेकिन ऊँट और लामा दो ऐसे स्तनधारी प्राणी हैं जिनके RBC में केन्द्रक पाया जाता है।
  • RBC का रंग लाल या रूधिर का रंग लाल हीमोग्लोबिन के कारण होता हैं
  • हीमोग्लोबिन के केन्द्र में आयरन धातु पायी जाती है।
  • ऊँट एक ऐसा स्तनधारी प्राणी है जिसकी RBC का आकार सबसे बड़ा होता है।
  • हिरन की RBC का आकार सबसे छोटा होता है।
  • यदि किसी व्यक्ति को कुछ दिनों के लिए अंतरिक्ष या माउण्ट एवरेस्ट पर्वत पर छोड़ दिया जाए तो RBC की संख्या और आकार दोनों बढ़ जाएंगे।
  • RBC की संख्या मनुष्य के शरीर में 5 से 5.5 लाख प्रति घन मिली मीटर होती है।
  • RBC का मुख्य कार्य ऑक्सीजन का परिवहन करना है।

WBC – श्वेत रूधिर कणिकाएँ ( White Blood Corpuscles )

  • WBC को ल्यूकोसाइट के नाम से जाना जाता है।
  • WBC का निर्माण मनुष्य के शरीर में श्वेत अस्थिमज्जा से होता है।
  • WBC का जीवनकाल मनुष्य के शरीर में लगभग 8 से 10 दिन का होता है।
  • WBC की संख्या मनुष्य के शरीर में लगभग 5000 हजार से 9000 प्रति घन मिली मीटर होती है।
  • RBC और WBC का अनुपात रूधिर में 600 : 1 होता है।
  • WBC आकार में अमीबा के आकार की होती है अर्थात इनका कोई निश्चित आकार नहीं होता है।
  • WBC का मुख्य कार्य हानिकारक जीवाणुओं से शरीर की सुरक्षा करना है।
  • आकार में सबसे बड़ी WBC मोनोसाइट्स होती है।
  • लिम्फोसाइट प्रकार की WBC आकार में सबसे छोटी होतीहै।
  • संख्या में सबसे अधिक न्यूट्रोफिल प्रकार की WBC पायी जाती है।

रूधिर पटलिकाएँ ( Blood Platelets )

  • रूधिर पटलिकाओं को थ्रोम्बोसाइट्स के नाम से जाना जाता है।
  • रूधिर पटलिकाओं का निर्माण लाल अस्थिमज्जा वाले भाग से होता है जो संरचना में प्लेट के आकार के होते हैं।
  • रूधिर पटलिकाओं का जीवनकाल लगभग 8 से 10 दिन का होता है।
  • रूधिर पटलिकाएँ रूधिर का थक्का बनाने में सहायता करती है।
  • इनकी संख्या मनुष्य के शरीर में लगभग 3 से 5 लाख प्रति घन मिली मीटर होती है।
  • डेंगू जैसे विषाणुजनित बिमारी में शरीर में प्लेटलेट्स की संख्या कम हो जाती है क्योंकि डेंगू के विषाणु प्लेटलेट्स को खा जाते हैं।

रूधिर परिसंचरण तन्त्र में निम्नलिखित अंग कार्य करते हैं- (i) हृदय ( Heart ), (ii) धमनी ( Artery ), (iii) शिरा ( Vein ), (iv) केशिका (Cappilary)। इनमें- हृदय का मुख्य कार्य हैरक्त का आदान-प्रदान धमनी एवं शिराओं के माध्यम से (पम्पिंग क्रिया द्वारा) शरीर की सभी कोशिकाओं तक।

हृदय की संख्या और चैम्बर

मनुष्य में 1 हृदय 4 कोष्ठकीय होते हैं।

मत्स्य वर्ग में 1 हृदय 2 कोष्ठीय , सरीसृप रेंगकर चलने वाले जन्तु) और उभय चरों में 1 हृदय 3 कोष्ठीय होता है।

मगरमच्छ ‘क्रोकोडाइल’ (घड़ियाल) ऐसा सरीसृप है, जिसमें हृदय 4 कोष्ठीय (Chambered) होता है।

पंक्षीवर्ग एवं स्तनधारी वर्ग में हृदय 4 कोष्ठीय होता है।

केचुए में हृदय की संख्या 4 जोड़ी (8 हृदय) पाये जाते हैं।

काररोच के हृदय में 13 चैम्बर पाये जाते हैं।

RBC - लाल रूधिर कणिकाएँ ( Red Blood Corpuscles )
RBC – लाल रूधिर कणिकाएँ ( Red Blood Corpuscles )

मनुष्य का हृदय 4 कोष्ठकों (वेष्मों) में बंटा होता है जिसमें ऊपर के 2 आलिंद ( Auricle ) तथा नीचे के 2 निलय ( Ventricle ) कहलाते हैं।

  • बायाँ आलिंद और बायाँ निलय एक ‘कपाट’ द्वारा जुड़े होते हैं।
  • इसी प्रकार दायाँ आलिन्द और दायाँ निलय भी एक कपाट द्वारा जुड़े होते हैं। आलिंद की दीवारें पतली तथा निलय की दीवारें (Walls) मोटी होती हैं।
  • अशुद्ध रक्त दाहिने आलिंद में शिराओं (Interior Venacava तथा Posterior Venacava) द्वारा पहुँचते हैं तथा यहाँ से अशुद्ध रक्त दाहिने निलय को पहुँचा दिये जाते हैं।
  • दाहिने निलय द्वारा अशुद्ध रक्त शुद्धीकरण (Purification) के लिए 2 पल्मोनरी धमनी (यक एक अपवाद है) द्वारा दोनों फेफड़ों ( Lungs ) को पहुँचाया जाता है।
  • यहाँ (फेफड़ों) से शुद्ध रक्त पल्मोनरी शिरा (यह भी एक अपवाद है) द्वारा बायें आलिंद को पहुँचाया जाता है।
  • शुद्ध रक्त बायें आलिंद से बायें निलय को तथा बायें निलय से रक्त सम्पूर्ण शरीर को पम्प कर धमनियों द्वारा पहुँचाया जाता है।
  • धमनी में रक्त रूक-रूक कर तथा शिरा में लगातार बहता है।
  • मनुष्य में धड़कन की दर औसतन 72 बार प्रतिमिनट है किन्तु उत्तेजनाओं के समय 200 बार तक पहुंच जाती है।
  • मानव जाति में नर का हृदय 350 ग्राम तथा मादा का 250-300 ग्राम का होता है।
  • हृदय को रक्त पहुँचाने वाली धमनी ‘कोरोनरी धमनी’ कहलाती है और इस धमनी में ‘कोलेस्ट्राल’ की मात्रा बढ़ जाने पर हृदय आघात ( Heart Attack ) हो जाता है।
  • सामान्य मनुष्य में रक्त दाब ( Blood Pressure ) 120/80 mmHg पारे के दाब के बराबर होता है।
  • सामान्य मनुष्य में रक्त की मात्रा 5 से 6 लीटर तक होती है।
  • रक्त शरीर भार का 7 से 8% (लीटर में) होता है, अर्थात् रक्त की मात्रा शरीर के भार का लगभग 1/13 वाँ भाग होती है।
  • मानव रक्त में हीमोग्लोबिन की मात्रा 12 से 15 ग्राम प्रति 100 मिलीलीटर पाया जाता है।
  • चिकित्सालयों के ‘ब्लडबैंक’ में रक्त को लगभग 40 डिग्री फारेनहाइट ताप पर एक महीने तक सुरक्षित रखा जाता है।
  • इसमें रक्त को जमने से रोकने के लिए सोडियम साइट्रेट तथा सोडियम ऑक्सजलेट रसायन मिलाये जाते हैं।
  • ये रसायन रक्त को जमाने वाले तत्व कैल्शियम को प्रभावहीन कर देते हैं।
  • उच्च रक्त दाब की स्थिति हृदय के संकुचित होने पर बनती है, जिसे “सिस्टोल’ (Systole) कहते हैं तथा निम्न रक्त दाब की स्थिति हृदय के फैलने पर बनती है, जिसे ‘डायस्टोल’ (Distole) कहते हैं।
  • हृदय धड़कन का नियन्त्रण ‘साइनोएट्रियल’ (S.A. Node) द्वारा होता है।
  • रक्त में 55% प्लाज्मा तथा 45% ब्लड कणिकाएं पायी जाती है।
  • प्लाज्मा का अधिकांश भाग जल तथा कुछ भाग खनिज लवण, प्रोटीन, वसा इत्यादि से बना होता है।
WBC - श्वेत रूधिर कणिकाएँ ( White Blood Corpuscles )
WBC – श्वेत रूधिर कणिकाएँ ( White Blood Corpuscles )

रक्त कणिकाएं 3 प्रकार की होती हैं

(i) लाल रक्त कणिकाएं (कार्य-ऑक्सीजन और कार्बन डाई आक्साइड का परिसंचरण)

(ii) श्वेत रक्तकणिकाएं (कार्य- हानिकारक जीवाणुओं से रक्षा)

(iii) प्लेटलेट्स (कार्य- रक्त के जमने में सहायता करना)

रूधिर का निर्माण लम्बी हड्डियों के लाल अस्थि मज्जा ( Red Bone Marrow ) में तथा शुद्धिकरण ( Purification ) फेफड़े में होता है।

प्लीहा ( Spleen ) को ‘रक्त का कब्रिस्तान’ कहते हैं, क्योंकि मृत रक्त कोशिकाएं यहाँ संगृहीत होती हैं।

रक्त में पायी जाने वाली प्रमुख धातु ‘लोहा’ ( Iron ) होती है।

कृत्रिम रक्त रासायनिक रूप में ‘फ्लोराकार्बन’ होते हैं, जो ऑक्सीजन के अच्दे वाहक (Carrier) होते हैं।

कोई रक्त ग्रुप न होने के कारण यह किसी भी व्यक्ति को दिया जा सकता है।

कृत्रिम हृदय’, जिसका दूसरा नाम- ‘जार्विका-7’ ( Zarvic-7 ) है, प्लास्टिक एवं एल्युमिनियम धातु का बना होता है। इसका वजन 300 ग्राम होता है।

हृदय का प्रत्यारोपण

विश्व परिप्रेक्ष्य में हृदय का सफल प्रत्यारोपण क्रिश्चियन बर्नार्ड ( दक्षिण अफ्रीका ) ने किया।

भारत में हृदय का सफल प्रत्यारोपण डॉ. वेणूगोपाल ( केरल ) 1994 में किये थे।

Blood Group रूधिर समूह

‘रक्त समूह’ की खोज K. Landsteiner ने 1900-1902 में की।

Blood GroupAntigenAntibody
AAB
BBA
ABAB
OAB
रक्त समूह 4 हैं

AB Blood Group : Universal Acceptor सर्वग्राही

0 Blood Group : Universal Donor सर्वदाता होता है।

समूह ‘A’- इसमें एन्टीजन A और ऐण्टीबाडी B पाये जाते हैं। समूह ‘B’- इसमें एन्टीजन B और ऐण्टीबाडी A पाये जाते हैं।

समूह ‘AB’- इसमें एन्टीजन A और B दोनों पाये जाते हैं और कोई ऐण्टीबाडी (Antibody) नहीं होते हैं।

समूह ‘0’- इसमें कोई भी एण्टीजन नहीं पाया जाता और A तथा B एण्टीबाडी पाये जाते हैं।

इनमें रक्त समूह ‘A’ रक्त समूह A और 0 से रक्त ले सकता है तथा A और AB रक्त समूह के व्यक्ति को रक्त दे सकता है।

रक्त समूह ‘B’ वाला व्यक्ति रक्त समूह B और 0 से रक्त ले सकता है तथा B और AB को रक्त दे सकता है।

रक्त समूह AB किसी भी रक्त समूह के व्यक्ति से रक्त ले सकता है तथा केवल AB रक्त समूह वाले व्यक्ति को दे सकता है।

रक्त समूह ‘O’ में कोई एन्टीजन नहीं पाया जाता, परन्तु एन्टीबाडी A तथा B दोनों पाया जाता है, इसलिए रक्त समूह 0 काा व्यक्ति सिर्फ ‘O’ समूह से रक्त ले सकता है तथा सभी रक्त समूह को दे सकता है। अर्थात् ‘AB’ सर्वग्राही (Universal Acceptor) तथा ‘O’ सर्व दाता (Universal Donor) है।

नोट : माता-पिता के रक्त समूह के आधार पर बच्चे के रक्त समूह के निर्धारण से सम्बन्धित प्रश्न भी पूछे जाते हैं। इसका निर्धारण निम्नांकित चार्ट के अनुसार होता है

रूधिर आधान ( Blood Transfusion)

Blood GroupCan be donateCan be received
AA, ABA, O
BB, ABB, O
ABABA, B, AB, O
OA, B, AB, OO

Rh कारक : यह व्यक्ति की लाल रक्त कणिकाओं में पाये जाने वाला एक प्रकार का Antibody है।

इसे सर्व प्रथम रीसस‘ जाति के बन्दर में Landsteiner तथा A.S. Wiener द्वारा 1940 में खोजा गया। जिनमें यह पाया जाता है, उन्हें RH ( Positive ) तथा जिनमें नहीं पाया जाता, उनहें Rh ( Negative ) कहते हैं।

लगभग 90% लोगों में Rh कारक पाया जाता है। Rh’ रक्त के व्यक्ति को Rh रक्त देने पर उसका रक्त संलयित हो जायेगा और व्यक्ति की मृत्यु हो जायेगी।

यदि Rh निगेटिव वाली माता के उदर में Rh पॉजिटिव वाला शिशु है ( Rh पिता से प्राप्त होता है ) तो शिशु में बन रहा Rh पॉजिटिव रक्त की कुछ मात्रा माता में स्थानान्तरित हो जाती है, जिससे Rh पॉजिटिव के खिलाफ माता के रक्त में Antibodies का निर्माण होता है ( क्योंकि माता के रक्त में शिशु से पहुँचा Rh* माता के लिए एण्टीजन ( Antigen ) का काम किया)।

यह Antibody माता के रक्त से बच्चे को आहार के रूप में प्राप्त होता है। यह एण्टीबाडी शिशु के शरीर में एण्टीजन का काम करता है और लाल रक्त कण को नष्ट कर देता है जिससे शिशु की प्रायः मृत्यु हो जाती है।

इस अवस्था को Erythroblastosis Foetalis’ कहते हैं। इस अवस्था की सम्भावना प्रथम गर्भधारण में कम होती है

  • ‘लार’ (SALIVA) में कौन सी एन्जाइम पायी जाती है ? -एमाइलेज (AMYLASE)
  • दूध को पचाने वाली एन्जाइम कौन-सी है ? – ‘रेनीन’ (RENNIN)
  • पाचन तन्त्र का सबसे लम्बा भाग कौन है ? –’छोटी आँत’
  • सेलुलोज का पाचन कहाँ होता है ? -सीकम (CAECUM) में
  • वह कौन-सा सरीसृप है जिसमें 4 कोष्ठीय हृदय होता है ? -क्रोकोडाइल (घड़ियाल)
  • किस धमनी’ (ARTERY) में अपवाद स्वरूप ‘अशुद्ध रूधिर’ का परिसंचरण (CIRCULATION) होता है ? -पल्मोनरी
  • किस ‘शिरा’ (VEIN) में अपवाद स्वरूप ‘शुद्ध रक्त’ का परिसंचरण होता है ? -पल्मोनरी
  • मनुष्य में हृदय धड़कन (स्पंदन) की दर प्रतिमिनट औसतन कितनी है ? -72 बार।
  • किस धमनी में ‘कोलेस्ट्राल की मात्रा बढ़ जाने पर ‘हृदय आघात’ (HEART ATTACK) हो जाता है ? -कोरोनरी में
  • ‘रक्त’ का शुद्धिकरण कहाँ होता है ? -फेफड़ों में
  • ‘रक्त का कब्रिस्तान’ किसे कहते हैं ? -प्लीहा (SPLEEN) को
  • रक्त में पायी जाने वाली प्रमुख धातु कौन-सी है ? -लोहा (IRON)
  • कृत्रिम रक्त रासायनिक रूप से क्या होते हैं ? -फ्लोरो कार्बन
  • ‘जार्विक-7’ (ZARVIC-7) क्या है ? -कृत्रिम हृदय
  • मुख में बैक्टीरिया को मारने का काम कौन सा एन्जाइम करता है ? -लाइसोजाइम (LYSOZYM)

Shikshit.Org :- हमें योगदान दें ( Contribute To Us )