Barmer – बाड़मेर

कपड़ों पर रंगीन छापों के लिए विख्यात इस नगर की स्थापना 13वीं सदी में परमार रा धणीधर के पुत्र बाहादा राव ने की थी। ज्ञातव्य है कि बाहादा | राव (बाड़ राव) के नाम पर इस नगर का नाम रखा गया।

बाहादा राव द्वारा बसाया गया मूल नगर उत्तर-पश्चिम में वर्तमान बाड़मेर नगर से 6 किमी. दूर स्थित है। इसे जूना बाड़मेर के नाम से जाना जाता है।

भीमाजी रत्नावत ने विक्रम संवत् 1642 में वर्तमान Barmer – बाड़मेर को बसाया।

विरात्रा माता का मंदिर : चौहटन से लगभग 10 किमी. दूर लाख एवं मुद्गल के वृक्षों के बीच रमणीय पहाड़ों की एक घाटी में स्थित भोपा जनजाति की कुलदेवी का मंदिर। यह 400 वर्ष पुराना बताया गया है।

किराडू : बाड़मेर-मुनाबाव रेल मार्ग पर खड़ीन रेलवे स्टेशन के पास हाथमा गाँव के पास स्थित जैन मंदिरों का प्रसिद्ध स्थल। यहाँ स्थित 5 प्राचीन मंदिरों में सोमेश्वर, शिव, विष्णु व ब्रह्मा मंदिर प्रसिद्ध है। यहाँ स्थित सन् 1161 के शिलालेख के अनुसार पहले इसे किरातू कूप के नाम से जाना जाता था। = किराडू को राजस्थान का खजुराहो कहा जाता है।

मल्लीनाथ का मंदिर :यह बालोतरा से लगभग 10 किमी. दूर लूनी की तलहटी में स्थित है। यहाँ राव मल्लीनाथ ने चिरसमाधि ली थी। समाधि स्थल पर भक्तजनों द्वारा निर्मित मल्लीनाथ का मंदिर और उनकी चरण पादुकाएँ दर्शनीय है। यहाँ चैत्र बदी एकादशी से चैत्र सुदी एकादशी तक पशुमेला लगता है जिसे मल्लीनाथ का मेला या तिलवाड़ा पशु मेला के नाम से जाना जाता है।

नागणेची माता का मंदिर पंचपदरा के समीप नागोणा ग्राम में स्थित इस मंदिर में विद्यमान लकड़ी की प्राचीन मूर्ति दर्शनीय है।

आलमजी का धोरा धोरीमन्ना पंचायत समिति मुख्यालय की पहाड़ी की ओट में आलमजी का मंदिर बना हुआ है। यहाँ पर माघ व भादवा सुदी में मेला भरता है।

यह घोड़ों का तीर्थ स्थल के उपनाम से प्रसिद्ध स्थल है।

जसोल : Barmer – बाड़मेर की पूर्व दिशा में यह प्राचीन नगर विद्यमान है। जसोल में 12वीं एवं 16वीं सदी मे निर्मित जैन मंदिरों के अलावा माताजी का मंदिर भी दर्शनीय है। यह राणी भटियाणी के मेले का आयोजन स्थल भी है कभी मल्लानी का राज्य रहे, जसोल को यह नाम राठौड़ों के उपवंश के वंशजों द्वारा मिला है।

मनाना/कानन गैर मेला : बसंत ऋतु में भरने वाला मेला जिसमें लोक परम्परा एवं लोकनृत्य का अनूठा प्रदर्शन (रातभर चलने वाला गैर नृत्य) देखने को मिलता है।

सिवाना दर्ग : जालोर से 30 किमी. दूर स्थित सिवाना में राजा राजभोज क पुत्र श्री वीरनाराण द्वारा वि.सं. 1011 में छप्पन की पहाड़ियों (छप्पन की पहाड़ियों में हल्देश्वर की पहाड़ी सबसे ऊंची है) में निर्मित यह दुर्ग अपनी विशालता के कारण प्रसिद्ध हैं कल्ला रायमलोत का थड़ा सिवाणा दुर्ग में स्थित है। – अपने दुर्भेद्य स्वरूप के कारण सिवाणा का दुर्ग संकटकाल में मारवाड़ के राजाओं की शरणस्थली रहा।

किलोण : Barmer – बाड़मेर के प्राचीन गढ़ किलोण का निर्माण मारवाड़ के राठौड़ राजपूत राव सलखा के ज्येष्ठ पुत्र मल्लीनाथ की चौथी पीढ़ी में रतोजी के बेटे राव भीमोजी ने सं. 1609 में करवाया था। यहाँ जोगमाया एवं नागणेची माता के मंदिर भी है। |

खेड़ : लूनी नदी के किनारे स्थित प्रसिद्ध वैष्णव तीर्थ स्थान। 13वीं सदी में राठौड़ वंश के संस्थापक राव सिंहाजी एवं उनके पुत्र आसनाथ ने खेड़ को जीतकर अपना राज्य स्थापित किया। यहाँ अभी भी प्राचीन वैभव के अवशेष देखे जा सकते हैं, जिनमें क्षतिग्रस्त दीवारों से घिरा रणछोड़राय जी का एक पुराना मंदिर है जिसके द्वार पर गरुड़ की मूर्ति है।

जूना : Barmer – बाड़मेर से 42 किमी. दूर स्थित स्थल जहाँ 12-13वीं सदी के शिलालेख व जैन मंदिर के स्तम्भ दर्शनीय है। 17वीं सदी में यही स्थान बाहड़मेरू या बाहड़गिरी के नाम से जाना जाता था। औरंगजेब के समय यह वीर दुर्गादास का निवास रहा।

कोटड़ा का किला : शिव तहसील के कोटड़ा गाँव में स्थित इस किले का निर्माण किराडू के परमार शासकों द्वारा करवाया गया। इस किले में सरगला नामक पीने के पानी का कुआं भी है। यह कभी जैन सम्प्रदाय की विशाल नगरी था।

चौहटन : भारत में गोंद उत्पादन के लिए प्रसिद्ध क्षेत्र। यहाँ प्रति 4 साल बाद सोमवति (पौष माह) अमावस्या का अर्द्ध कुम्भ की मान्यता प्राप्त सूईयां मेला आयोजित होता है।

सूईयाँ मेला : बाड़मेर जिले में पाक सीमा से सटे चौहटन में सूईयाँ मेला पौष माह की अमावस्या सोमवार, मूल नक्षत्र और व्यतिपात योग के संगम से आयोजित होता है। |*

पार्श्वनाथ जैन मंदिर : Barmer – बाड़मेर शहर में स्थित श्री पार्श्वनाथ जैन मंदिर दर्शनीय है। 12वीं सदी में बने इस मंदिर में शिल्पकला, कांच व चित्रकला के आकार व रूप दर्शनीय है।

गिरल : पहला लिग्नाइट आधारित बिजलीघर प्लांट यहाँ स्थापित किया गया है। |.

नाकोड़ा : बालोतरा से 9 किमी. दूर नागर की भाकरियाँ (झाकरियाँ) नामक पहाड़ी पर स्थित मेवा नगर/वीरानीपुर के नाम से प्रसिद्ध स्थल। इस स्थल पर भैरव जी (1511 में आचार्य कीर्ति रत्न सूरी द्वारा स्थापित) तथा पार्श्वनाथ का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है। * शिव : यहाँ डिफेन्स ऑर्डनेंस फैक्ट्री की स्थापना की जाएगी।

मंगला-I : बायतू क्षेत्र की नागणा पंचायत क्षेत्र की जोगासर गाँव में ब्रिटेन की केयर्न एनर्जी कम्पनी द्वारा खोजे गये तेल भण्डार को दिया गया नाम।

बाटाडू का कुआँ : बायतु पंचायत समिति के बाटाडू ग्राम में आधुनिक पाषाण कला से बना संगमरमर का कुआं दर्शनीय है

कपूरड़ी, जालिपा यहाँ सर्वाधिक मात्रा में लिग्नाइट कोयला मिलता है।

पचभद्रा झील : इस झील प्राप्त नमक में 98% तक सोडियम क्लोराइड की मात्रा पायी जाती है। माना जाता है कि पंचा नामक भील ने इस झील के किनारे खेड़ा या पुरवा की स्थापना की थी इसी कारण इस झील को पंचभद्रा झील कहते हैं। |

बालोतरा : रंगाई-छपाई तथा बंधेज के लिए प्रसिद्ध स्थल। ज्ञातव्य है कि लूणी नदी का जल बालोतरा तक मीठा और इसके आगे ख |

कपालेश्वर महादेव का मंदिर : Barmer – बाड़मेर जिले के चौहटन की विशाल पहाड़ी के बीच स्थित कपालेश्वर महादेव का मंदिर 13वीं शताब्दी में निर्मित किया गया है। ऐसा कहा जाता है कि पांडवों ने अपने वनवास का अंतिम समय यहीं छिपकर बिताया था। यहाँ से 2 किमी. दूर बिशन पागलिया नामक पवित्र स्थान है जहाँ भगवान विष्णु के चरण चिन्ह पूजे जाते हैं।

– यहीं स्थित पहाड़ों पर 14वीं सदी के एक दुर्ग के अवशेष मौजूद है जिसे हापाकोट कहते हैं। इसका निर्माण जालोर के सोनगरा राजा कान्हड़देव के भाई सालमसिंह के पुत्र हापा ने करवाया।

गरीबनाथ का मंदिर : इसकी स्थापना वि.सं. 900 में हुई। इसका पुराना नाम शिवपुरी या शिवबाड़ी होना पाया जाता है।

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