राठौड़ वंश का इतिहास – History Of Rathore Dynasty

राठौड़ वंश का इतिहास - History Of Rathore Dynasty
राठौड़ वंश का इतिहास – History Of Rathore Dynasty

 मारवाड़ के राठौडो को दक्षिण भारत के राष्ट्रकूट या कन्नौज के राठौड़ो का वंशज बताया जाता हैं।

राव सीहाRao Siha

  • पालीवाल ब्राह्मणों की सहायता के लिए राव सीहा बदायूं से 1240 ई. में खेड़ा (बालोतरा) आता हैं। और अपनी राजधानी बनाता हैं।
  •  राव सीहा को – ‘राजस्थान के राठौड़ो का आदिपुरूष’ कहा जाता हैं। 
  • 1273 ई. में गायों की रक्षा करते हुये राव सीहा पाली के बीठू गांव में मारा जाता हैं।
  •  बीठू गांव में राव सीहा का स्मारक बना हुआ हैं।

राव धूहडRao Dhuhad

  • यह कर्नाटक से कुल देवी ‘नागणेची’ की मूर्ति लेकर आता हैं। 
  • इसे बाड़मेर गांव के नागाणा गांव में स्थापित किया गया हैं। 
  • इनके छोटे भाई का नाम ‘धांधल’ था। ये लोकदेवता पाबू जी के पिता थे।

रावल मल्लीनाथRawal Mallinath

  • राजस्थान के प्रसिद्ध लोकदेवता 
  • इन्होनें अपनी राजधानी ‘मेवानगर’ (नाकोड़ा) बनायी। 
  • मल्लीनाथ के नाम पर ही मारवाड़ क्षेत्र को मालाणी कहते हैं। 
  • भाई – ‘वीरम’ (मल्लीनाथ ने अपने बेटे जगमाल को राजा न बनाकर वीरम को राजा बना दिया।)

राव चूण्डाrao chunda

  • ‘इन्दा’ (प्रतिहार) शासको ने चूण्डा को दहेज के रूप में मण्डौर दिया। 
  • मंडोर को राजधानी बनाया।

राव जोधाRao Jodha :- 1438-1489 ई.

  • 1459 ई. में जोधपुर शहर की स्थापना करता हैं। 
  • चिड़िया ढूंक पहाड़ी पर मेहरानगढ़ किला बनवाता हैं। 
  • मेहरानगढ़ किले की नींव ‘करणीमाता’ ने रखी थी। 
  • जोधा के 5 वें पुत्र बीका ने बीकानेर की स्थापना की।

राव मालदेव राठौड़ – Maldev Rathod

चन्द्रसेनchandrasen

मालदेव ने अपने बड़े बेटे को राजा न बनाकर अपने छोटे बेटे चन्द्रसेन को राजा बनाया। अतः इसके बड़े भाई राम व उदयसिंह अकबर के पास चले गये। अकबर ने जोधपुर पर आक्रमण किया। अतः चन्द्रसेन भाद्राजूण चला गया।

1570 ई. में का अकबर का नागौर दरबार 

  1. जैसलमेर – हरराज 
  2. बीकानेर – कल्याणमल -अकबर की अधीनता स्वीकार की। 
  3. चन्द्रसेन – का बड़ा भाई उदयसिंह – (जोधपुर)
  • चन्द्रसेन भी इस नागौर दरबार में गया था। 
  • चन्द्रसेन स्थिति को अनुकूल न देखकर यहां से भाद्रा जूण चला जाता हैं। 
  • अकबर भाद्राजूण पर आक्रमणकर देता हैं। चन्द्रसेन सिवाणा (बाड़मेर) चला जाता हैं। 
  • भटकते हुए राव चन्द्रसेन की पाली (सोजत) के पास सारण (सिंचियाई गांव) की पहाड़ियों में मृत्यु हो गयी। 
  • चन्द्रसेन को ‘मारवाड़ का भूला – बीसरा शासक’ कहते हैं। 
  • चन्द्रसेन को ‘मारवाड़ का प्रताप’ कहते हैं। 
  • इसे ‘प्रताप का अग्रगामी’ कहते हैं। 
  • महाराणा प्रताप की राजतिलक में चन्द्रसेन भी उपस्थित था। 
  • अकबर ने 1572 ई. में बीकानेर के रायसिंह को जोधपुर का प्रशासक नियुक्त कर दिया। 

मोटा राजा उदयसिंह – Mota Raja Udai Singh

अपनी बेटी मानी बाई’ की शादी जहांगीर के साथ कर दी गयी। इसे इतिहास में ‘जोधाबाई’ कहा जाता

इसे ‘जगत गोसाई’ भी कहते हैं। 

मानी बाई का बेटा ‘खुर्रम’ (शाहजहां) था। 

इस प्रकार मोटा राजा उदयसिंह जोधपुर का पहला राजा, जिसने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली। और उनसे वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किए।

कल्ला रायमलोतKalla Raimlot

यह मोटा राजा उदयसिंह के छोटे भाई रायमल का बेटा था। 

इन्होनें सिवाणा का दूसरा साका किया। (अकबर के खिलाफ युद्ध) 

कल्ला रायमलोत ने अपनी मृत्यु से पहले ही पृथ्वीराज राठौड़’ (बीकानेर) से अपने ‘मरसिये’ लिखवा लिए। 

किसी वीर के युद्ध में वीरता पूर्वक लड़ते हुए मारे जाने पर कवि द्वारा उसकी वीरता पर लिखे जाने वाले दोहे। 

जसवंत सिंहJaswant Singh :- 1638-1678 ई.

  • अमरसिंह- जसवंतसिंह का बड़ा भाई, ये नागौर का राजा था। मतीरे की राड (लडाई):- (1644ई.) 
  • बीकानेर राजा कर्णसिंह V/s नागौर का अमरसिंह 
  • अमरसिंह शाहजहां के दरबार में उसके मीर बख्शी (सेनापति) सलावत खां की हत्या कर देता हैं। 
  • अमरसिंह राठौड़ को ‘कटार का धणी’ कहते हैं।
  • अमरसिंह की 16 खम्भों की छतरी ‘नागौर’ के किले में बनी हैं। 
  • आज भी राजस्थान के ‘ख्याल व रम्मतों’ में अमरसिंह को याद किया जाता हैं।
  • शाहजहां के पुत्रों के उत्तराधिकारी संघर्ष में जसवंतसिंह ने दारा का पक्ष लिया। 
  • शाहजहां ने जसवंतसिंह को ‘महाराजा’ की उपाधि दी। 

धरमत का युद्ध :- दारा V/s औरगजेब 

  • इस युद्ध में दारा की सेना का सेनापति जसवतसिंह था। 
  • दूसरे सेनापति कासिम खां से अनबन होने पर जसवतसिंह युद्ध के बीच में जोधपुर वापस आ जाता हैं। 
  • धरमत के युद्ध में हारकर वापस आने पर जसवतंसिंह की रानी जसवतं दे हाड़ी ने किले के दरवाजे बंद कर दिये। 
  • औरगंजब ने जसवंतसिंह राठौड़ को अफगानिस्तान भेज दिया। (काबुल का गर्वनर बनाकर) 
  • वहीं पर ‘जमरूद’ का थाना नामक स्थान पर 1678 ई. में जसवतंसिंह की मृत्यु हो जाती हैं। 
  • औरगंजेब ने इसकी मृत्यु पर कहा- ‘आज कुफ्र का दरवाजा टूट गया।’ (धर्म का विरोध करने वाला)
  • जसवतसिंह की मृत्यु के 1 साल बाद ही औरगंजेब 1679 ई. में ‘जजिया कर’ लगाता हैं। 
  • जसवतसिंह के बेटे पृथ्वीसिंह ने शेर के साथ लड़ाई की। औरगंजेब ने इसे विषैली पोशाक देकर मरवा दिया। 
  • जब जसवतसिंह की मृत्यु हुयी तब उनकी दोनों रानियाँ गर्भवती थी। 
  • औरगजेब ने आगरा में इन्हें रूपसिंह राठौड़ की हवेली में नजरबंद कर दिया। 
  • कालान्तर में इनसे अजीतसिंह व दलथम्बन नाम पुत्र होते हैं। 

– पुस्तकें – 

  1. अपरोक्ष सिद्धान्त सार 
  2. प्रबोध चन्द्रोदय
  3. आनन्द विलास 
  4. भाषा भूषण 

– दरबारी विद्वान

मुहणौत नैणसी

(1) ‘नैणसी री ख्यात’ (पुस्तक) – इसमें जोधपुर के राजाओं की वशांवली लिखी गयी हैं। – पहली बार क्रमबद्ध इतिहास लेखन। 

(2) मारवाड़ रा परगना री विगत- जनगणना का उल्लेख। – इसे मारवाड़ का गजेटियर कहतें कहते हैं। 

मुंशी देवी प्रसाद ने मुहणौत नैणसी को राजपूताने का अबुल फजल कहा हैं।

अजीतसिंह 1679-1724 ई.

  • औरगजेब ने 36 लाख रूपये के बदले अमरसिंह के पाते इन्द्रसिंह को राजा बना दिया। 
  • दुर्गादास राठौड़ दोनों रानियों व राजकुमारों को लेकर वहां से निकल जाता हैं। 
  • अजीतसिंह को बचाने के लिए एक गौरा नाम महिला ने सहायता की थी। – ‘गौरा’ को ‘मारवाड़ की पन्नाधाय’ कहते हैं। 
  • मारवाड़ के राष्ट्रगीत ‘धूसों’ में गौरा का नाम लिया जाता हैं। 
  • गौरा की छतरी जोधपुर में बनी हैं। 
  • सिरोही जिले के कालिन्द्री गांव में अजीतसिंह को जयदेव पुरोहित के घर में मुकुन्ददास खिची की देखरेख  में रखा जाता हैं।
  • दुर्गादास औरंगजेब के बेटे अकबर से विद्रोह करवा देता हैं। 
  • ओरंगजेब ने दुर्गादास व अकबर में फूट डलवा दी। 
  • अकबर के बेटा – बुलन्द अख्तर – बेटी सफीयतुन्निसा दोनों दुर्गादास के पास रह जाते हैं, 
  • दुर्गादास इनकी धार्मिक शिक्षा का प्रबन्ध करता हैं। तथा कालान्तर में ईश्वरदास नागर के कहने पर औरंगजेब को सौंप देता हैं। 
  • औरंगजेब की मृत्यु के बाद ‘बहादुरशाह’ अजीतसिंह को जोधपुर का राजा बना देता हैं। 
  • अजीतसिंह मुगल बादशाह फर्रुखसियर से अपनी बेटी इन्द्रकवर की शादी करता हैं। 
  • यह अंतिम राजकुमारी (राजपूत) थी, जिसकी किसी मुगल बादशाह से शादी हुई। 
  • 23 जून 1724 को अजीतसिंह के बेटे ‘बख्तसिंह’ ने अजीतसिंह की हत्या कर दी। 
  • अजीतसिंह की मृत्यु पर उनकी चिंता में जानवरो ने स्वेच्छा से अपनी जान दे दी।

दुर्गादास राठौड़Durgadas Rathod

  • पिता का नाम – आसकरण 
  • जन्म स्थान – सालवा 
  • जागीर – लुणेवा गांव।
  •  अजीतसिंह ने शासक बनने के बाद दुर्गादास को देश निकाला दे दिया था। 
  • दुर्गादास यहां से मेवाड़ महाराणा ‘अमरसिंह द्वितीय’ के यहां चला गया। 
  • अमरसिंह ने इसे ‘रामपुरा’ व विजयपुर की जागीरें दी। 
  • यहां से दुर्गादास उज्जैन चला जाता हैं। 
  • उज्जैन में क्षिप्रा नदी के किनारे दुर्गादास की छतरी बनी हुयी हैं। 
  • दुर्गादास को ‘मारवाड़ का अणबिन्धिया मोती’ तथा ‘राजपूताने का गेरीबाल्डी’ कहते हैं। 
  • कर्नल जेम्स टॉड इसे ‘राठौड़ो का यूलीसेज’ (उद्वारक) कहते हैं।

अभयसिंहAbhay Singh :- 1724-1749 ई.

  • खेजड़ली की घटना:- विक्रमी संवत 1787 ई. को भाद्रपद शुक्ल दशमी को खेजड़ली नामक गांव में अमृतादेवी नामक विश्नोई महिला अपने पति रामोजी व अपनी तीन बेटियों के साथ वृक्षों को बचाने के लिए शहिद हो गयी। 
  • इसमें कुल 363 लोगों ने अपना बलिदान दिया था। इसलिए आज भी भाद्रपद शुक्ल दशमी को हम शहीद दिवस के रूप में मानते हैं। 
  • इसी दिन विश्व का एकमात्र वृक्ष मेला लगता हैं। 
  • अमृतादेवी के नाम पर सामाजिक वानिकी के क्षेत्र के लिए पुरस्कार दिया जाता हैं। (वन्य व वन्य जीव)

दरबारी विद्वान

  1. करणीदान – सूरज प्रकाश (बिड़द सिणगार)
  2. कारभाण – राजरूपका सबदार ‘सर बुलदं खान’ के

इन दोनों पुस्तकों में अभयसिंह व अहमदाबाद के सूबेदार ‘सर बुलदं खान’ के बीच युद्ध का वर्णन हैं।

मानसिंहMan Singh :- 1803-1843 ई.

  • जालौर घेरे के समय ‘देवनाथ’ द्वारा मानसिंह के राजा बनने की भविष्यवाणी की। 
  • मानसिंह ने राजा बनते ही देवनाथ को अपना गुरू बनाया। 
  • नाथें के सबसे बड़े मंदिर ‘महामंदिर’ का निर्माण करवाया। 
  • ‘नाथचरित्र’ नामक पुस्तक लिखी। 
  • 1805 ई. में जोधपुर के किले में एक पुस्तकालय बनवाते हैं, जिसे ‘मानपुस्तक प्रकाश’ कहते हैं। 
  • 1807 ई. में ‘गिंगोली का युद्ध’ होता हैं। 
  • 1818 ई. में अंग्रेजी से संधि कर लेता हैं। 
  • इसके दरबार में कवि बांकीदास था। 
  • मानसिंह ने इन्हें ‘कविराज’ की उपाधि दी।

पुस्तक

  1. बांकीदास री ख्यात
  2. कुकवि बत्तीसी
  3. दातार बावनी
  4. मान जसो मंडन – बांकीदास ने अग्रेजो का साथ देने वाले राजाओं की निन्दा की।